भक्त-
कान्हा कान्हा कहे मेरा मन, कान्हा जाने कहाँ छुपा
मुरली की आवाज़ सुना दे, इतनी तो कर दे कृपा ।
कान्हा-
कान्हा कहे मैं तेरे ह्रदय में, रहता हूँ, रहूँगा सदा
तू मुझको कहाँ पर ढूंढे, तेरे पास ही तो है पता |
भक्त-
कभी गुरु में, कभी पिता में मैंने तुझको देखा है।
कभी भाई में कभी सखा में भेस बदलकर बैठा है।
कान्हा-
कभी गुरु कभी पिता कभी भाई और कभी सखा
इन सब अवतारों में, मैं तो तेरे लिए ही बना मिटा
भक्त-
मिल गया अब मुझको कान्हा, नहीं, वह तो साथ ही था
जब जब आशीर्वाद मिला था, सर पर उसका हाथ ही था।
कान्हा-
सच्चे भक्त का हाथ थामकर, मैं राह दिखलाता हूँ
धर्म हो या कर्मभूमि हो, साथ हूँ, सारथी कहलाता हूँ।
- नेहा की कलम से…


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