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1 Jan 2026

कान्हा कान्हा कहे मेरा मन


भक्त-

कान्हा कान्हा कहे मेरा मन, कान्हा जाने कहाँ छुपा

मुरली की आवाज़ सुना दे, इतनी तो कर दे कृपा ।


कान्हा-

कान्हा कहे मैं तेरे ह्रदय में, रहता हूँ, रहूँगा सदा

तू मुझको कहाँ पर ढूंढे, तेरे पास ही तो है पता |


भक्त-

कभी गुरु में, कभी पिता में मैंने तुझको देखा है।

कभी भाई में कभी सखा में भेस बदलकर बैठा है।


कान्हा-

कभी गुरु कभी पिता कभी भाई और कभी सखा

इन सब अवतारों में, मैं तो तेरे लिए ही बना मिटा


भक्त-

मिल गया अब मुझको कान्हा, नहीं, वह तो साथ ही था

जब जब आशीर्वाद मिला था, सर पर उसका हाथ ही था।


कान्हा-

सच्चे भक्त का हाथ थामकर, मैं राह दिखलाता हूँ

धर्म हो या कर्मभूमि हो, साथ हूँ, सारथी कहलाता हूँ।


                                                 -   नेहा की कलम से…





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